Posts

✍️ श्री की कलम से

 आलेख        श्री राम संग जटायु जीवन का आदर्श...        राम नाम से गूॅंजता, अवधपुरी श्री धाम।        श्रध्दा से सुमिरन करें,होत सफल सब काम।।         वर्तमान दौर में हम देखते हैं हर चीज का पुनर्निर्माण हो रहा है फिर वह हमारा घर हो चाहे कार्यस्थल जब की यह सब क्षणिक सुख के पर्याय है। भौतिक युग में हम गुमराह मुसाफिर की तरह चले जा रहे अब समय आ गया है  हमें हमारी अंतरात्मा पर चढ़ी आधुनिकता की अनावश्यक माया को परे रखकर अपनी अमूल्य संस्कृति और संस्कारों को अपनाना होगा यह आज के युग की मांग भी है और जरूरत भी, इसके लिए ज़रूरी है  हमें पूरी तरह जागरूक रहना होगा और यह तभी संभव है जब हम रामायण को अपना आधार स्तम्भ मानकर रामायण के प्रसंगों को अपने स्मरण में रखते हुए उसका अनुसरण करने का प्रयास करें। तभी अंतरात्मा की शुद्धि संभव है। धर्म ,कर्म ,न्याय और नीति का पाठ हमें राम जी से बेहतर और  कोई नहीं सीखा पाएगा।          वनगमन के समय जब पंचवटी के पास रामजी देवी सीता और लक्ष्मण ज...

श्री राम संग जटायु जीवन का आदर्श...

 आलेख        श्री राम संग जटायु जीवन का आदर्श...        राम नाम से गूॅंजता, अवधपुरी श्री धाम।        श्रध्दा से सुमिरन करें,होत सफल सब काम।।         वर्तमान दौर में हम देखते हैं हर चीज का पुनर्निर्माण हो रहा है फिर वह हमारा घर हो चाहे कार्यस्थल जब की यह सब क्षणिक सुख के पर्याय है। भौतिक युग में हम गुमराह मुसाफिर की तरह चले जा रहे अब समय आ गया है  हमें हमारी अंतरात्मा पर चढ़ी आधुनिकता की अनावश्यक माया को परे रखकर अपनी अमूल्य संस्कृति और संस्कारों को अपनाना होगा यह आज के युग की मांग भी है और जरूरत भी, इसके लिए ज़रूरी है  हमें पूरी तरह जागरूक रहना होगा और यह तभी संभव है जब हम रामायण को अपना आधार स्तम्भ मानकर रामायण के प्रसंगों को अपने स्मरण में रखते हुए उसका अनुसरण करने का प्रयास करें। तभी अंतरात्मा की शुद्धि संभव है। धर्म ,कर्म ,न्याय और नीति का पाठ हमें राम जी से बेहतर और  कोई नहीं सीखा पाएगा।          वनगमन के समय जब पंचवटी के पास रामजी देवी सीता और लक्ष्मण ज...

श्री की कलम से ✍️

 नारी  हरपल मुस्कुराती है नदियां के प्रवाह सी  अनवरत बहती है  हृदय की संदूक में कितने ही अरमानों को बंद किए रखती हैं  सजते है उसकी भी ऑंखों में अनन्त सपने  जिन्हें पूरा करने का  उसमें साहस भी है और कौशल भी  अपने पंखों को खोलकर  उड़ना चाहती है छूना चाहती है वह भी सफलता का गगन राह में हर कदम पर खड़ी  दिखती हैं दायित्वों की चट्टानें जिन्हें लांघकर चले तो  सबकी शिकायत भरी निगाहें  उसपर जम जाती हैंं हर निगाह में , हर रिश्ते में उससे होती है केवल अपेक्षाएं जिसे पूरा करते - करते वह स्वयं के अरमानों पर बिछा देती है सहनशीलता की चादर  और‌ ओढ़े रहती है समझौते की दोहड़ ऑंखों से बहते दर्द को  छुपा लेती है मुस्कराहट के पर्दे से सृष्टि की सर्वोत्तम नायिका ही तो है नारी !  सदियों से सुशोभित होती रही ही विविध उपाधियों से कभी सृष्टि की रचयिता कहा गया तो कभी देवी स्वरूप कहकर मान बढ़ाया नदियां की उपमा देकर  उसके प्रवाह में डाल दिए जाते है दायित्वों से भरें पुष्प जानते हैं सभी, इसका प्रवाह  हर स्थिति में बहना जानता है ...

श्री की कलम से ✍️

  कहानी          "पितृदोष"           "आज शाम जल्द ही घर आ जाना पितृपक्ष निकट आ रहा है । मॉं बाबूजी के श्राद्ध पर पंडित जी को देने के लिए कपड़े लाने हैं, कहती हुई रीता किचन में आयी और राहुल ऑफिस के लिए निकल पड़ा था।" अभी अभी तो वह देवांश को दवाईयॉं देकर आयी थी फिर उसने कराहते हुए मम्मी मम्मी पुकारना शुरू किया रीता दौड़ी-दौड़ी उसके पास गई देखा तो बदन बुखार से तप रहा था। आठ दिन पहले ही बड़े बेटे सारांश का एक्सीडेंट हुआ था, अभी उस समस्या से उभरे ही नहीं और अब देवांश की बिमारी,  बच्चों की अवस्था देख उसका ममतामयी  हृदय द्रवित हो गया। घर में आये दिन कुछ ना कुछ समस्या बनी ही रहती थी कभी बच्चे बीमार तो कभी वह स्वयं और बच्चों के पीछे भी कोई ‌ना कोई मुसीबत लगी ही रहती।                        आज रीता ने मन‌ ही मन‌ निश्चय किया ज्योतिष जी को‌ जन्मकुंडली बताकर ही रहेगी। पता था राहुल तो‌ साथ चलने से रहें। अपनी सहेली राधा को‌ फोन‌ किया शाम के समय जाना तय हुआ, राहुल  ऑफिस...

श्री की कलम से ✍️

 कविता  कश्मकश  बड़ी कश्मकश है जिंदगी  के फलसफे में मन‌ तितली सा उड़ता है ख्वाबों की चित्रकारी को हकीकत के रंगों से भरना चाहता है ,  लक्ष्य पाने की  जद्दोजहद में डूबा रहता है मन‌ की सुनो तो रिश्ते नाते खफा हो जाते हैं वह देखना चाहते हैं हरपल दायित्वों का निर्वहन  करता ,एक ऐसा व्यक्तित्व  जो यंत्रवत चलता रहे  अनवरत चलता ही रहे...... मन मायूस हो जाता है स्वयं की इच्छाओं की उपेक्षा देखकर ,  बड़ा मुश्किल होता है अपनी इच्छाओं को, अपने ही  पैरों तले रौंदते हुए चलना अक्सर जंग छिड़ जाती है मन और दायित्वों के बीच दोनों एक ही कश्ती में सवार किनारे पहुॅंचना चाहते हैं पर मझधार में रह जाते है  मन की सुनो तो ,  रिश्ते रुठ जाते हैं रिश्तों को सॅंवारे तो  मन खफा होकर  उदासी की चादर ओढ़ लेता है बड़ी कश्मकश है जीवन के सफर में ।  ©राजश्री राठी स्वरचित रचना  rathirajshree85@gmail.com   (नवभारत में प्रकाशित हो चुकी है)

श्री की कलम से ✍️

लेख * खुशियों की चाबी*                पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है मानव जनम बहुत पुण्याई के पश्चात मिलता है  । मानव जीवन में ही मनुष्य मनचाहा लक्ष्य साध कर अपनी प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर  सकता है , परमार्थ और जनकल्याण के अच्छे कार्यों को करते हुए अपने जीवन को सार्थक करने का सौभाग्य केवल मानव को ही मिला है ।  हमारे द्वारा की गई छोटी सी मदद् किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है ।  अपनी रुचि के अनुरूप कला से जुड़ने का , ज्ञान प्राप्त करने का लाभ भी मानव को मिला है नृत्य , संगीत , चित्रकारी , लेखन , पठन यह सारी कलाऍं हमारे व्यक्तित्व विकास में सहायक तो है ही साथ ही हमारे लिए खुशियों ‌के द्वार भी इनके माध्यम से खुलते है और निरर्थक बातों में उलझने से हम बचे रहते है, क्यों कि जैसे ही हमें अवकाश मिलता है हमारी पसंदीदा कला आकर हमारे  हृदय पटल का  द्वार खटखटाने लगती है और हम उसमें खो जाते हैं।                बमुश्किल मिले इस मानव जीवन को हम कितनी ही बार व्यर्थ में स्वयं को कष्ट...

अस्तित्व

                            कहानी ‌                           अस्तित्व ‌मीरा शून्य सी नजरो से आसमान में टकटकी लगाए देख रही थी।जीवन की आपाधापी में उम्र के पचास बसंत देख चुकी उसकी अवस्था उस गुलमोहर के भांति थी ।जो गर्मी की तपन सहकर भी अपनी रंगत बिखेरते हुए खिलखिलाई रहती ।आज बार बार उसकी आंखे सजल हो रही थी। किंतु अश्रु लुढ़ककर गालो पे झलके उस से पूर्व ही वह उन्हें अपनी कोरो में समेटने का प्रयास कर रही थी।यही तो उसके स्वभाव का हिस्सा रहा है ।मन के भीतर चल रहे आंतरिक द्वंद को उसके  चेहरे की खोकली हसी ने कभी उजागर नहीं होने दिया ।प्रकृति ने भी सारे समझौते ,समर्पण ,सहनशीलता ,जैसे तोहफे नारी के दामन में डालकर उसे पूज्यनीय बना दिया । वहीं दूसरी ओर उसे बार बार अवहेलना का शिकार कर आहत किया जाता है ।सीता को अग्नि परीक्षा देकर अपनी पवित्रता का प्रमाण देना पड़ा वहीं द्रोपदी को भरी सभा में चीरहरण क...