श्री की कलम से ✍️

 नारी 

हरपल मुस्कुराती है

नदियां के प्रवाह सी 

अनवरत बहती है 

हृदय की संदूक में

कितने ही अरमानों को

बंद किए रखती हैं 

सजते है उसकी भी ऑंखों में

अनन्त सपने 

जिन्हें पूरा करने का 

उसमें साहस भी है

और कौशल भी 

अपने पंखों को खोलकर 

उड़ना चाहती है

छूना चाहती है वह भी

सफलता का गगन

राह में हर कदम पर

खड़ी  दिखती हैं

दायित्वों की चट्टानें

जिन्हें लांघकर चले तो 

सबकी शिकायत भरी निगाहें 

उसपर जम जाती हैंं

हर निगाह में , हर रिश्ते में

उससे होती है

केवल अपेक्षाएं

जिसे पूरा करते - करते

वह स्वयं के अरमानों पर

बिछा देती है

सहनशीलता की चादर 

और‌ ओढ़े रहती है समझौते की दोहड़



ऑंखों से बहते दर्द को 

छुपा लेती है

मुस्कराहट के पर्दे से

सृष्टि की सर्वोत्तम नायिका

ही तो है नारी ! 

सदियों से सुशोभित होती रही ही

विविध उपाधियों से

कभी सृष्टि की रचयिता कहा गया

तो कभी देवी स्वरूप कहकर मान बढ़ाया

नदियां की उपमा देकर 

उसके प्रवाह में डाल दिए जाते है

दायित्वों से भरें पुष्प

जानते हैं सभी,

इसका प्रवाह 

हर स्थिति में बहना जानता है 

काश! इन उपाधियों के बदले 

उसके दामन में आ जाएं

कुछ खुशियां, सुकून

और भर लें वह भी अपने सपनों में

यर्थाथ के सुंदर रंग

और‌ जी ले अपनी जिंदगी

अपने अरमानों के संग। 


✍️ राजश्री राठी 

नवभारत में प्रकाशित कविता 

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