श्री राम संग जटायु जीवन का आदर्श...

 आलेख


       श्री राम संग जटायु जीवन का आदर्श...


       राम नाम से गूॅंजता, अवधपुरी श्री धाम।

       श्रध्दा से सुमिरन करें,होत सफल सब काम।। 


       वर्तमान दौर में हम देखते हैं हर चीज का पुनर्निर्माण हो रहा है फिर वह हमारा घर हो चाहे कार्यस्थल जब की यह सब क्षणिक सुख के पर्याय है।

भौतिक युग में हम गुमराह मुसाफिर की तरह चले जा रहे अब समय आ गया है  हमें हमारी अंतरात्मा पर चढ़ी आधुनिकता की अनावश्यक माया को परे रखकर अपनी अमूल्य संस्कृति और संस्कारों को अपनाना होगा यह आज के युग की मांग भी है और जरूरत भी, इसके लिए ज़रूरी है  हमें पूरी तरह जागरूक रहना होगा और यह तभी संभव है जब हम रामायण को अपना आधार स्तम्भ मानकर रामायण के प्रसंगों को अपने स्मरण में रखते हुए उसका अनुसरण करने का प्रयास करें। तभी अंतरात्मा की शुद्धि संभव है। धर्म ,कर्म ,न्याय और नीति का पाठ हमें राम जी से बेहतर और  कोई नहीं सीखा पाएगा। 


        वनगमन के समय जब पंचवटी के पास रामजी देवी सीता और लक्ष्मण जी समेत पहुॅंचे तो सीता जी को दूर से ही एक बड़ा सा पक्षी दिखा और उन्होंने रामजी से कहा ऐसा विशाल पक्षी इससे पहले न कभी देखा न सुना उस पक्षी को देखते ही लक्ष्मण जी के मन में संशय हुआ कहीं यह कोई मायावी राक्षस तो नहीं उन्होंने अपने कमान से तीर निकाला और अपने भाई से आज्ञा लेने लगे भैया आपकी आज्ञा हो तो इन्हें पलभर में यमलोक पहुॅंचा दूं। रामजी ने लक्ष्मण जी को समझाते हुए कहा लक्ष्मण हमें चित्रकूट में सिखाया गया था जब तक हमें मित्र अथवा शत्रु का पूरी तरह पता नहीं चलता हमें किसी तरह का निर्णय लेना उचित नहीं अन्यथा हमें पछताना पड़ता है इस तरह रामजी हमें धैर्य धारण करने के सीख देते हैं। 


     रामजी ने थोड़ा आगे बढ़कर बड़े नम्रता पूर्वक कहा हे पक्षीराज मैं दशरथ पुत्र राम अपने अनुज और भार्या समेत आपको प्रणाम करता हूॅं। 

पुत्र राम मेरा नाम जटायु है तुमने मित्र दशरथ का नाम लेकर मुझे पुलकित कर दिया है। देवासुर संग्राम के दौरान शंबरासुर  वध के समय महाराज दशरथ से मित्रता हुई थी। तुम पंचवटी में पर्णकुटी बनाकर रहो , मैं पहरी की भॉंति तुम्हारी रक्षा करुंगा।

यह प्रसंग वृद्ध जटायु जी के मन में वृद्धावस्था के दौरान भी सेवाभाव की भावना दर्शाता है। 


      जटायु जी अपने पिता के मित्र हैं यह पता चलते ही रामजी पुलकित होते हैं,वह सोचते हैं अब वह स्वयं को सनाथ महसूस करेंगे उन्हें ऐसा लगता है जैसे उन्हें अपने पिता मिल गए हो वह हर्ष से लक्ष्मण को कहते हैं यहीं अपनी पर्णकुटी बनाओं। जटायु 

जी पशु थे फिर भी बड़ो के प्रति आदर और उनका सम्मान तो रामजी दर्शाते ही है साथ ही हमें यह भी बताते हैं बडे बुजुर्गो की छत्रछाया में रहने से  सुरक्षित रहते हैं, यह संदेश हमें रामजी देते हैं जो अनुकरणीय है वर्तमान दौर में विभक्त परिवारों की और बढ़ता रूझान अनेक समस्याओं को जन्म दे रहा है। 


       सीता हरण पश्चात जैसे ही जटायु जी देखते हैं आकाश मार्ग से रावन सीता को जबरदस्ती लेकर जा रहा है तो वह रावन को विनती करते है सीता को छोड़ दो यह मेरी पुत्रवधू समान है और इसकी रक्षा करने का मैंने प्रण लिया है वह अपने ऑंखों के सामने हो रहे अन्याय, अत्याचार को नहीं देख पाए किंतु अभिमानी रावन जटायु जी का अपमान करता है। ऐसे में जटायु जी स्वयं अपने पंखों से रावन के साथ युद्ध करते हैं। वर्तमान दौर में हम देखते हैं देशभर में कहीं बलात्कार, चोरी, डकैती, हत्याएं ऐसी अनेक घटनाएं मनुष्य के सामने होती है किंतु इसे रोकने का साहस कोई नहीं कर पाता और आज यहीं  वजह है दिनों-दिन ऐसी घटनाएं बड़े पैमाने पर घट रही है। रावन प्रवृत्ति के लोगों की संख्या भी इसीलिए बढ़ रही है। आसपास कितना ही अत्याचार हो किंतु स्वयं को सुरक्षित रखना केवल यहीं मानसिकता जन्म ले रही है। रामायण का यह प्रसंग संवेदना

तो दर्शाता ही है साथ ही अन्याय के विरोध में आवाज उठाने हेतु हमें प्रेरित करता है।

जटायु जी ने रावन को मारने का हर संभव प्रयास किया किंतु जब रावन ने अपनी चंद्रहास खड़क से जटायु के पर काट दिए तो वह जमीन पर गिर पड़े अपने जान की  बाजी लगाकर उन्होंने सीता की रक्षा करने का हर संभव प्रयास किया। 


          प्राण स्वयं के तज दिए , रखा वचन का मान।

           रक्षा नारी की करना, देते जटायु ज्ञान ।।

      

           राम , लक्ष्मण जब वन से लौटकर आ रहे थे तो उन्हें वन में जटायु जी जमीन पर घायल अवस्था में दिखे जिसे देखकर राम लक्ष्मण का हृदय व्याकुल हो उठा। जटायु जी ने अपने तड़पते हुए प्राणों को जैसे सीता हरण का वृत्तांत रामजी तक पहुॅंचाने हेतु ही रोक रखा था। जटायु जी ने कहा रावन सीता को जबरदस्ती हरण कर दक्षिण दिशा की और ले गया‌ है वह बहुत व्यथीत थी। उन्होंने रामजी से कहा हर पति का कर्तव्य होता है अपने पत्नी की रक्षा करना तुम्हें अपना कर्तव्य पूरा करना है राम सीता को रावन से छुड़ाकर तुम्हें लाना होगा ,मुझे क्षमा करना पुत्र मैं अपने पुत्रवधू की रक्षा नहीं कर पाया। उनका अंतिम समय निकट आया तब रामजी कहते हैं आप स्वर्गलोक में सीता हरण की खबर पिता जी से मत कहना अन्यथा वह दुखी होंगे, अपने स्वर्गीय पिता के प्रति वन में रहते हुए इतनी चिंता करना यह केवल रामजी ही कर सकते हैं। अभी तो वसीयत नामा में थोड़ा कम ज्यादा होने पर रिश्ते पूरी तरह खत्म हो जाते है। जटायु जी राम जी की गोद में प्राण त्याग देते हैं। वे गिध्द थे किंतु रामजी ने अपने मन पर संयम रखा एक तरफ सीता हरण तो दूसरी ओर पिता समान जटायु जी की मृत्यु फिर भी उन्होंने अपनी ऑंखों से अश्रु नहीं निकाले क्यों की अश्रु में खार होता है और उनके मन में यह था कहीं अश्रु घायल जटायु जी के जख्मों पर गिरेंगे तो उन्हें पीड़ा होगी पशुओं के लिए हृदय में करुणा रखना यह हमें रामजी सीखा रहे हैं। आजकल अपने शौक के खातिर कुछ लोग शिकार तक करते हैं सरकार द्वारा ऐसे अपराधियों पर कारवाई होती है किंतु इतनी संवेदनहीनता जन्म ले रही इस पर किसी तरह अंकुश लगाना जरूरी है। 

       रामजी विधिवत जटायु जी का अंतिम संस्कार करते हैं उसके पश्चात ही वह सीता जी के खोजबीन की रूप-रेखा तय करते हैं।

रामायण का यह प्रसंग धैर्य, कर्तव्य, अत्याचार का विरोध, पशु प्रेम के प्रति जागरूकता दर्शाता है जिसका वर्तमान दौर में अभाव पाया जा रहा है।


जड़ चेतन से प्रेम रखें,देते संदेश रघुवीर।

निर्मल तन-मन सदा रखें ,मिट जाती  सब पीर।



श्रीमती राजश्री राठी 

अकोला (महाराष्ट्र)

444001


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