श्री की कलम से ✍️
कहानी
"पितृदोष"
"आज शाम जल्द ही घर आ जाना पितृपक्ष निकट आ रहा है । मॉं बाबूजी के श्राद्ध पर पंडित जी को देने के लिए कपड़े लाने हैं, कहती हुई रीता किचन में आयी और राहुल ऑफिस के लिए निकल पड़ा था।" अभी अभी तो वह देवांश को दवाईयॉं देकर आयी थी फिर उसने कराहते हुए मम्मी मम्मी पुकारना शुरू किया रीता दौड़ी-दौड़ी उसके पास गई देखा तो बदन बुखार से तप रहा था। आठ दिन पहले ही बड़े बेटे सारांश का एक्सीडेंट हुआ था, अभी उस समस्या से उभरे ही नहीं और अब देवांश की बिमारी, बच्चों की अवस्था देख उसका ममतामयी हृदय द्रवित हो गया। घर में आये दिन कुछ ना कुछ समस्या बनी ही रहती थी कभी बच्चे बीमार तो कभी वह स्वयं और बच्चों के पीछे भी कोई ना कोई मुसीबत लगी ही रहती।
आज रीता ने मन ही मन निश्चय किया ज्योतिष जी को जन्मकुंडली बताकर ही रहेगी। पता था राहुल तो साथ चलने से रहें। अपनी सहेली राधा को फोन किया शाम के समय जाना तय हुआ, राहुल ऑफिस से आ गये तो देवांश को देख लेंगे यह सोच वह तय समय पर ज्योतिष जी के पहुॅंच गई वह भी उसकी मनोदशा भॉंप चुके थे लंबी चौड़ी पूजा पाठ बताते हुए उन्होंने पितृदोष बताया तो रीता कहने लगी मैं तो हर बरसी, श्राद्ध पर पंडित जी को भोजन करा यथा शक्ति दान दक्षिणा , कपड़े देती ही हूॅं। अमावस को भी भोज सामग्री लेनी मायी आती हैं फिर यह पितृदोष कैसे ...?
मन ही मन वह झुंझलाते हुए बड़बड़ाती वहॉं से निकली तभी राधा ने कहा बाबूजी के ऑंखों में दवा डालने का समय हो गया , मॉं भी जल्दी भोजन करती है ,अब मैं चलती हूॅं कहते हुये राधा ने तेज कदमों से घर का रुख लिया।
राधा रीता की बचपन की सहेली थी विपरित परिस्थितियों में भी वहं हमेशा सामान्य रहती । अत्याधिक अनुशासन प्रिय परिवार और सिमीत आय में भी वह कुशलता से घर-गृहस्थी संचालित कर सास ससुर की सेवा करते हुये बच्चों को अच्छे से पढ़ा रहीं थी । "बच्चों पर तो मॉं सरस्वती की ऐसी कृपा बरसी जैसे कोई अदृश्य शक्ति स्वयं राधा के जीवन में बहार लाने बेताब हो रही हों, बच्चे भी आज्ञाकारी और सुशील थे।"
रीता ने घर आते ही सबको भोजन कराया और अपने शयनकक्ष में गई । "नींद आज ऑंखों से कोसों दूर थी हर तरफ ॲंधियारा नज़र आने लगा उसे बेचैन देख राहुल ने कहॉं क्या हुआ रीता? राहुल के अति आग्रह करने पर ज्योतिष ने कहीं सारी बात विस्तार से बतायी और कहने लगी हमें पितृदोष निवारण हेतु पूजा पाठ करना ही हैं।" राहुल के भीतर बरसों से छिपा सब्र का बॉंध फूट पड़ा वह कहने लगा अब इस पूजा का कोई औचित्य नहीं हैं यह तो मात्र अंधविश्वास और आंडबर है .....! "माता _ पिता के जीते जी उन्हें मान सन्मान देकर खुश रखा जायें तो अन्य किसी पूजा की आवश्यकता नहीं होती रीता ।"
बड़े बुजुर्गो के अंतस से निकले आर्शीवाद में सारी पीड़ा हरने की क्षमता होती है । माता पिता तो सदैव ही बच्चों का हित और मंगल ही चाहते हैं किंतु उनके दुखद आत्मा की पुकार किसी ना किसी तरह परमात्मा तक पहुॅंच ही जाती है । कर्मों का फल तो यहीं चुकाना पड़ता हैं। मेरे मॉं- बाबूजी को तुमने दिल से अपनाया ही नहीं । तुम्हारे मन में उनके लिए कभी स्नेह ,अपनेपन की भावना नहीं रही तुम्हारा प्यार
पाने वहं तड़पते रहे , तुम्हें तो बच्चों का उनसे बातचीत करना भी समय बर्बादी लगता , ना ही तुमने कभी उनके पसंद का बनाकर उन्हें कुछ खिलाया - पिलाया ,उनके ही परिश्रम से बनाए आशियां में वे बेगाने होते गये और तनाव के चलते समय से पूर्व ही वृद्धावस्था ने उन्हें घेर लिया ,उन्हीं की जमा पूंजी से उनकी बीमारी का इलाज होता किंतु तुम्हें तो वह भी खटकता था , तुम्हारे इस रव्वैये के चलते मेरी बहनों ने भी मायके का मोह त्याग दिया । घर में हरपल तनाव की वजह तुम्हारी संकुचित सोच ही थी तुम्हारे द्वारा पहुॅंचाए गये घावों को ईश्वर ब्याज समेत पूनः तुम्हें लौटा रहा है।
©राजश्री राठी
अकोला (महाराष्ट्र)
rathirajshree85@gmail.com
Very True.👌👌
ReplyDeleteकर्तव्यकर्म से बचने की वांछा व धारणा भविष्य में अस्वस्थता, पाप और डर का पर्वत निर्माण करते हैं।
ReplyDeleteउपरोक्त विचार बड़ी कुशलता के साथ आपने कथा के द्वारा व्यक्त किया है।
आप अभिनंदन के पात्र हो।
बहुत बढ़िया
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