श्री की कलम से ✍️
कविता
कश्मकश
बड़ी कश्मकश है जिंदगी
के फलसफे में
मन तितली सा उड़ता है
ख्वाबों की चित्रकारी को
हकीकत के रंगों से भरना
चाहता है ,
लक्ष्य पाने की
जद्दोजहद में डूबा रहता है
मन की सुनो तो
रिश्ते नाते खफा हो जाते हैं
वह देखना चाहते हैं
हरपल दायित्वों का निर्वहन
करता ,एक ऐसा व्यक्तित्व
जो यंत्रवत चलता रहे
अनवरत चलता ही रहे......
मन मायूस हो जाता है
स्वयं की इच्छाओं की
उपेक्षा देखकर ,
बड़ा मुश्किल होता है
अपनी इच्छाओं को, अपने ही
पैरों तले रौंदते हुए चलना
अक्सर जंग छिड़ जाती है
मन और दायित्वों के बीच
दोनों एक ही कश्ती में सवार
किनारे पहुॅंचना चाहते हैं
पर मझधार में रह जाते है
मन की सुनो तो ,
रिश्ते रुठ जाते हैं
रिश्तों को सॅंवारे तो
मन खफा होकर
उदासी की चादर ओढ़ लेता है
बड़ी कश्मकश है
जीवन के सफर में ।
©राजश्री राठी
स्वरचित रचना
rathirajshree85@gmail.com
(नवभारत में प्रकाशित हो चुकी है)
अत्यंत सटिक शब्दों में ढाला है आपने दुविधा को
ReplyDeleteVery True...
ReplyDeleteअपनों के साथ दिल की भी सुना किजिए
चुपके चुपके अपने सपनों को बुना किजिए
मन का क्या है, वो है चंचल भरमाएगा,
अपनी राह ए मंजिल स्वयं ही चुना किजिए!!