अंकुर से अंकुश तक.....
गठबन्धन द्वारा लिए सप्तपदी के पश्चात परिवार की निर्मिती होती है ।विवाह मात्र उपभोग का माध्यम नहीं वह परिवार वृद्धि का पवित्र संस्कार है।जिसपर समूचे परिवार ,समाज और विश्व के प्रगति की बागडोर निर्भर है।वर्तमान जीवनशैली में भोर की स्वर्णिम किरणे अपनी सुनहरी रंगत बिखेरे उस से पूर्व ही दिल दहलाने वाली अंधियारी ख़बरें हमें आहत कर देती है ।आज प्रतिस्पर्धा के दौर में बच्चे दो चार स्पर्धा में पिछड़ भी गए तो चलेगा पर समाज और देश को अच्छा व्यक्तित्व सौपे यह हर अभिभावक की जिम्मेवारी है ।
परिवार यह बालक की प्रथम पाठशाला है यही से बीज अंकुरित होता है ।भौतिक संसाधनों का मायावी जाल हर आयु वर्ग को इतना प्रभावित कर रहा है जिसके चलते वित्तीय व्यवस्था परिवारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गई ।
आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ करने में माता _पिता दोनों व्यस्त है कई बार जिसके चलते अनेक समस्याएं जन्म ले रही है ।आज का बालक कल युवा हो समाज का संचालन करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। समाज के प्रगति की अमूल्य धरोहर उसके कंधो पर है यह हम भूल रहे है।
रोजाना अखबारों में चोरी डकैती ,अपहरण,बलात्कार ,एकतरफा प्यार में होनेवाले वाले तेजाब हमले में शिकार बेटियां किस व्यथा से गुजर रही है ,न जाने कितनी ही निर्भया की दर्दनाक चिखे देश के हर कोने में गूंज रही है। कैंडल मार्च निकाल लेने से क्या उन आत्माओं का दर्द कम हो जाएगा ?ऐसा भावना विहीन व्यक्तिव समाज में दुराचार को बढावा दे रहा है ।जब बच्चे अपने माता पिता की छत्र छाया में रहकर नैतिकता का पतन कर रहे है ।वह बालसुधार गृह में क्या संस्कारो को सीख पाएंगे ?आज अपराधी वृत्ति बढ़ने का कारण क्या है ,इस तरह चरित्रहीन पीढ़ी का निर्माण कहासे हो रहा है ,क्यों बच्चे माताओ की कोख को शर्मसार कर रहे है यह चिंतनिय है ।गौर किया जाए तो पता चलेगा कही ना कहीं संस्कारो के सिंचन में कमी आ रही है।आजकल बच्चो और अभिभावकों के बीच वार्तालाप में स्पर्धा,शिक्षा इसके अलावा और कोई विषय जैसे रहा ही नहीं।भौतिक संसाधनों की पूर्ति कर अभिभावक अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ रहे है । आज का युवा वर्ग अपनों से दूर हो सोशल मीडिया से नजदीकियां बनाना जादा पसंद कर रहा है । जिसके चलते अश्लीलता को बढ़ावा मिल रहा है अपनी इच्छापूर्ति हेतु वह गलत राह निकल पड़ता है । बच्चो को बचपन से समय देना होगा उनके साथ मित्रवत व्यवहार रखना होगा ।उनमें आत्मीयता ,आदर,स्त्री जाति के प्रति सम्मान की भावना को निर्माण करना होगा ।स्वतंत्रता समय की मांग है किंतु बच्चो की गलतियों पर हम अंकुश लगा सके इतना तो सामर्थ्य अभिभावकों में होना ही चाहिए ।वरना हमारी भी बहू,बेटियों का घर से निकलना दुभर हो जाएगा ।निर्भया के माता पिता की तरह न जाने कितनी ही माताओं की आत्माएं अग्नि में झुलस रही होंगी । अपराधियों को सजा मिलने पर उनका केवल प्रतिशोध कम होता है किंतु उनके घर की चहक सदा गम में तब्दील हो जाती है ,रोशनी की जगह अंधेरा अपना घर कर लेता है। जब जागो तभी सवेरा तो क्यों ना शिक्षा के साथ साथ हमारे भावी पीढ़ी को समाज में रहने के तौर तरीके भी सिखाए जाए ।अभिभावकों को स्वयं भी अपना व्यवहार शालीन , संयमित रखना होगा बच्चो पर उनकी प्रतिछाया का प्रभाव अधिक गिरता है ।तो जागो आनेवाली भोर हमें जागरूक रहने के लिए प्रेरित कर रही है ।
"प्रयत्न ज्योत जगमगाजाए ,तम का राज रहता नहीं ,स्वप्न चाहे जो भी हो वह कभी बिखरता नहीं ।"
राजश्री सुरेश राठी
अकोला (महाराष्ट्र)
Wonderful Thinking,Very good writing skill.Keep it Up...........
ReplyDeleteना बिखरेगा स्वप्न
ReplyDeleteनिखरेगा जैसे रत्न
प्रातःकालीन ये सुस्वप्न
साकार करें तेरे यत्न
Very nicely wrtitten
ReplyDeleteToo good
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति, सतीश लाखाेटिया नागपुर
ReplyDeleteThoughtful article .Baccho ko shiksha ke sath sanskar dena bhi jaruri hai.
ReplyDeletebahut sunder lekh ������
ReplyDeletebahut sunder lekh🙂👍💐
ReplyDeleteअविरत रहे प्रयत्न
ReplyDeleteतभी सागर से रत्न
प्राप्ती का सुस्वप्न
बिखरेगा नहीं, निखरेगा
बेहतरीन
ReplyDeleteVery nice article
ReplyDeleteVery nice & timely views
ReplyDeleteExcellent...
ReplyDeleteEach and every parents/ guardians must understand
all this thing.
👍👍👍👍👍👍
ReplyDeleteBahut badhiya
ReplyDeleteआज के समय की बिल्कुल सत्य व्यथा आपने सुंदर रूप से प्रस्तुत की है। आपके इस प्रयास के लिए आपको ढेरों बधाईयां। संक्षिप्त में मै कहूं तो आपने बखूबी कहा को हमे हमारी भावी पीढ़ी को सुशिक्षित ही नहीं बल्कि सुसंस्कारी भी बनानी पड़ेगी......
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